“मुखौटा”

चला मुखौटा पहन वो, लेकर पुलिंदा झूठ का
चढ़ा मंच पर ताने सीना, छप्पन अट्ठे सूत का
कहता है कि मेरे मित्रों, अच्छे दिन आएंगे
अभी तो ट्रेलर दिखाया है, पिक्चर भी दिखाएंगे

भूमि हो या संविधान हो, सब हथिया ले जाएंगे 
मनभाये कानूनों को, अभी तो और बनाएंगे
रोक सको तो रोको मित्रों, हुड़दंग हम मचायेंगे 
अभी तो ट्रेलर दिखाया है, पिक्चर भी दिखाएंगे

घुसपैठियों को छठी का, दूध याद दिलाएंगे 
देश के गद्दारो को भी, दूर यहाँ से भगाएंगे
धीरे धीरे चुपके से हम, खुद गद्दार बन जाएंगे
अभी तो ट्रेलर दिखाया है, पिक्चर भी दिखाएंगे

धर्म छोड़ो प्यारे भक्तों, जात पर भी लड़ायेंगे
बीच में गर आया कोई, दिन में तारे दिखाएंगे
विपक्ष करेगा क्या हमारा, उसे भी आजमायेंगे
अभी तो ट्रेलर दिखाया है, पिक्चर भी दिखाएंगे

बेरोजगारी है तो क्या, पकौड़े सबसे तलवायेंगे
महंगाई है तो अब, प्याज कभी ना खाएंगे
अर्थव्यवस्था गई भाड़ में, हिंदुत्व का शंख बजायेंगे
अभी तो ट्रेलर दिखाया है, पिक्चर भी दिखाएंगे

अच्छे दिन आएंगे मित्रों, अच्छे दिन आएंगे
पहले थोड़े बुरे तो चख लो, अच्छे भी आ जायेंगे
जल्दी भी क्या है मित्रों, चार साल और नचायेंगे
अभी तो ट्रेलर दिखाया है, पिक्चर भी दिखाएंगे

– मीठा करेला

“मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा”

पौने पांच की ट्रैन पकड़कर,पहले “गोधरा” जाऊंगा
वहाँ हुई दरिंदगी के, मैं सारे कागज़ लाऊंगा
चुन चुन कर दिखाउंगा, कुछ ना मैं छिपाऊँगा
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

चाहे हो वो, “सोहराबुद्दीन” का कागज़
या फ़िर हो, “इशरत जहां” का कागज़
मिल गया ये भी, “तड़ीपार” का कागज़
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

पता मुझे हैं बस इतना, कागज़ ये अधूरे हैं
“नागरिकता” ना मिलेगी, कागज़ ये ना पूरे हैं
रुको ज़रा तुम अभी मैं, कागज़ और दिखाऊंगा
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

कमीज की जेब में देखो, पड़ा हुआ “महाराजगंज” का कागज़
पतलून की जेब में तो देखो, मिलेगा “गोरखपुर” का कागज़
शाह – सिंघल का भी देखो, “कोबरा-पोस्ट” का कागज़
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, नागरिकता पा जाऊंगा

सबको कागज़ दिखाना हैं, गर “नागरिकता” पाना हैं
“NRC” का ज़माना हैं, “CAA” अब पुराना हैं
मिलकर देश बनाना हैं, कागज़ सभी दिखाना हैं
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

अभी ना पूरे हैं ये कागज़, अभी तो और दिखाना हैं
गर नकली लगे हो कागज़, तो असली भी दिखाना हैं
पर “नागरिकता” मुझे आज ही, यहाँ से लेकर जाना हैं
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

लो यह देखो, “कारगिल-ताबूत” का कागज़
इसे भी देखो, “नीरव” का कागज़
“मेहुल चौकसी” का भी कागज़, मुझको आज दिखाना हैं
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

“राफेल” का कागज़, “स्टाम्प” का कागज़
“व्यापम” का कागज़, “ललित” का कागज़
कागज़ सभी दिखाऊंगा, मैं नागरिक बन जाऊंगा
मैं कागज़ सभी दिखाऊंगा, “नागरिकता” पा जाऊंगा

पता मुझे हैं अच्छे से, तुम्हें चाहिए कैसे कागज़
“नीला” कागज़, “नारंगी” कागज़
“हरा” सा कागज़, खरा सा कागज़
ऐसे कागज़ तो नहीं हैं बंधु, यह ना दिखा पाऊंगा

अब ना और दिखाऊंगा, वरना “देशद्रोही” कहलाऊंगा
“गद्दार” भी कहलाऊंगा, अब ना और दिखाऊंगा
“नागरिकता” ना मिली तो, “घुसपैठि” ही बन जाऊँगा
पर राहत तो यह मिलेगी, कुछ दिन और जी पाऊंगा

  • मीठा करेला

“भौं – भौं”

प्रहरी हूँ प्रजातंत्र का, लोकतंत्र का, गणतंत्र का
सूंघता हूँ हर ख़बर, फिर भौंकता हूँ हर पहर
दिख जाता कोई तस्कर, कोलाहल करता दिनभर
रौब किसी का ना मुझपर, गुर्राता हूँ मैं सब पर
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

पहले की बात और थी, तब वफ़ादार था मैं भी
नया नया वो दौर था, तब निर्भीक था मैं भी
वक्त पुराना ढल गया , अब डरता हूँ मैं भी
फैंकी हुई हर हड्डी पर, अब मरता हूँ मैं भी
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

हुआ क्या ऐसा भी जो, नज़रो से इतना गिर गया
अपनी फितरत के उलट, मैं इतना क्यूँ संवर गया
तुम्हें सुनाऊ अपनी कहानी,मैं इतना क्यूँ बदल गया
और बताऊ अपनी जुबानी, मैं इतना क्यूँ रल गया
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

जा रहा मैं अपनी डगर, राह में इक मिला मगर
बोला तुझको खा जाऊंगा, गर भौंका तू मुझ पर
डरा नहीं मैं ज़रा भर, भौंका उस पर टूट कर
पर हड्डी डाली जब मुझ पर , काबू रहा ना खुद पर
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

अस्थि-प्रणय में खो गया, मैं पालतू उसका हो गया
भौंकता तो अब भी हूँ पर, मगर के हर इशारे पर
वो कहे तो पूँछ हिलाता, वो कहे तो दौड़ लगाता
लोकतंत्र को नीलाम कराता, संविधान को सूली चढ़ाता
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

मगर की रग में भी तो, लहू प्रजा का दौड़ रहा है
जाने क्या चाह रहा हैं, सबकुछ ये निगल रहा हैं
बाँट रहा हैं, काट रहा हैं, तोड़ रहा हैं, मरोड़ रहा हैं
मैं भी बेबस देख रहा हूँ, मुँह में हड्डी लिए खड़ा हूँ
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

जिसका मैं रखवाला था, उसी से गद्दारी की
इक हड्डी की खातिर मैंने, नरभक्षी से वफादारी की
धिक्कार मुझे हैं खुद पर, अब आना हैं अपनी डगर
भौंकूंगा अब इतना उस पर, भागेगा फ़िर इधर उधर
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

इशारों पर ना नाचूंगा, अब ये हड्डी ना चाहूंगा
भूखा ही मर जाऊंगा, पर दग़ाबाज ना कहलाऊंगा
प्रजातंत्र की रक्षा करूँगा, अब मगर से ना डरूंगा
लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ का, बल मैं उसको दिखला दूंगा
मैं भौंकता हूँ, क्या करूँ, काम ही मेरा हैं भौंकना

  • मीठा करेला

“CAA-NRC protest”

“जल रही हैं हवाएं, उबल रहा जल भी हैं
उथल-पुथल हुई धरा ये, गरज रहा गगन भी हैं
राख़ हुए पुष्प सभी ये, दहक रहा जंगल भी हैं
लगी कहाँ हैं अग्न ऐसी, सोच रहा अर्क भी हैं”